तुम और मैं
जैसे कागज़ पर लिखी एक हसीन कविता
कुछ एहसासात बिखेरती हुई
कुछ लम्हों को अलफ़ाज़ में पिरोती हुई
दिल के तारों को छूती हुई
ख़्वाबों को आँखों में सजाती हुई
जीने की इक आस जगाती हुई

तुम और मैं
जैसे सावन की पहली बरसात
जैसे सर्दी में धूप का एहसास
जैसे सागर का आलिंगन करता ठंडा हवा का झोंका
जैसे काले बादलों से पूर्णमासी के चाँद का झांकना
जैसे ओस की बूंदों के छूने से फूलों का खिलखिलाना
जैसे धरती और गगन का क्षितिज पर मिल जाना

तुम और मैं
जैसे खुदा से माँगी हुई एक दुआ
जैसे दिल से निकली एक खूबसूरत आरज़ू
जैसे वक़्त को ठहरने को मजबूर करता एक लम्हा
जैसे ज़हन में सहेज कर रखा हुआ मोहब्बत का वो पल
जैसे यादों के पिटारे से खुशियों के अनमोल पल ढूंढना
जैसे टूटते सितारे से माँगी हुई ख़्वाहिश का मुकम्मल होना

तुम, मैं और हमारी मोहब्बत
जैसे खुदा का एक बेश कीमती तोहफ़ा
जैसे अपने बन्दों पर की गयी इनायत
जैसे हौंसलों का तक़दीर से लड़ना
जैसे अधूरी दास्ताँ का दोबारा इब्तिदा होना
जैसे कायनात का हमें मिलाने की साज़िश करना
जैसे दो रूहों का रस्मों से परे मिलना

तुम और मैं …

©वन्दना भसीन

16.09.2021

“This post is a part of ‘UMeU’ Poetry Blog Hop #UMeUBlogHop organized by Manas Mukul . The hop is brought to you by Soul Craft and You, Me & The Universe.”